Thursday, March 31, 2011

विवेचना का राष्ट्रीय नाट्य समारोह बन चुका है जबलपुर में एक परंपरा


विवेचना द्वारा सन् 1994 से राष्ट्रीय नाट्य समारोह का आयोजन शुरू किया गया है। विवेचना का नाट्यदल पूरे देश में जाकर नाटकों का मंचन करता है। विवेचना के नाटकों के नियमित मंचन होते रहते हैं पर जबलपुर में ऐसे अवसर कम आते हैं जब दर्शक दूसरी संस्थाओं और निर्देशकों के नाटक देख सकें। विवेचना के द्वारा शुरू किये गये राष्टीय नाट्य समारोह के कारण जबलपुर और आस पास के शहरों कस्बों के रूचिसंपन्न दर्शकों को देश के प्रमुख निर्देशकों के नाटक देखने को मिले। इससे उन्हें देश के नाट्य संसार का परिचय मिला। विवेचना के अब तक आयोजित समारोहों में सर्वश्री हबीब तनवीर, बा.व.कारंत, बंसी कौल, सतीश आलेकर, जुगल किशोर, तनवीर अख्तर, दिनेश खन्ना, नादिरा बब्बर, दर्पण मिश्रा, अरूण पांडेय, उषा गांगुली, देवेन्द्र पेम, अरविंद गौड़, पियूष मिश्रा, रंजीत कपूर, नवीन चौबे, अनिलरंजन भौमिक, संजय उपाध्याय, इप्टा भिलाई, श्रवण कुमार, वेदा राकेश, नजीर कुरैशी, बलवंत ठाकुर, के.जी.त्रिवेदी, भूषण भट्ट, जावेद जैदी, श्रीमती गुलबर्धन, अलखनंदन, लईक हुसैन, कमलेश सक्सेना, पंकज मिश्रा, विजय कुमार, अजय कुमार, विवेक मिश्रा, अशोक राही, वसंत काशीकर, श्यामकुमार, किशोर कुलकर्णी दिनेश ठाकुर, जे पी सिंह अतुल पटेल, मानव कौल, एम सईद आलम महमूद फ़ारूखी के नाटक मंचित हो चुके हैं। विवेचना के विभिन्न समारोहों में नादिरा बब्बर, सरिता जोशी, आशीष विद्यार्थी सुनील सिन्हा, नेहा शरद, टॉम आल्टर जूही बब्बर आदि अपने अभिनय का जलवा बिखेर चुके हैं।
विवेचना का पहला नाट्य समारोह बहुभाषी था। इसमें हिन्दी के अलावा मराठी और बंगला के नाटक भी आमंत्रित किए गए। पर बंगाली दर्शकों के उत्साहप्रदर्शन में कमी के कारण बंगला नाटकों का मंचन संभव नहीं हुआ। सतीश आलेकर का नाटक महानिर्वाण पूना की टीम के उत्साहवर्धक सहयोग के कारण संभव हो पाया। पहले नाट्य समारोह का उद्घाटन स्व हबीब तनवीर ने किया। समारोह में हबीब साहब ने देख रहे हैं नैन का मंचन किया। यह मंचन आज भी दर्शकों को याद है। दूसरे दिन बंसी कौल के निर्देशन में वह जो अक्सर झापड़ खाता है का मंचन हुआ। नाटक बंसी कौल की डिजायन के कारण यादगार रहा। यह इस नाटक का पहला प्रदर्शन था जो अपेक्षित प्रशंसा नहीं बटोर सका। तीसरे दिन बा व कारंथ के निर्देशन में श्रीराम सेंटर, दिल्ली के कलाकारों ने बाबूजी का मंचन किया। इसमें राजेश तिवारी ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। उनका अद्भुत अभिनय दर्शकों को बहुत भाया। बाबूजी के मंचन ने धूम मचा दी और पहले समारोह का यह नाटक दर्शकों की भारी उपस्थिति के कारण भी याद किया जाएगा। चौथे दिन महानिर्वाण का मंचन हुआ था। पूना के कलाकारों ने नायाब प्रस्तुति दी। हालांकि मराठी दर्शकों की उपस्थिति बहुत कम थी।
विवेचना के एक साथी ने बंबई में नादिरा बब्बर का एक नाटक बात लात की हालात की देखा। उनका ब्रोशर लाए। नादिरा जी से बात की गई। वो जबलपुर आने को सहर्ष तैयार हो गईं। दूसरे समारोह में उनके दो नाटक हुए। बात लात की और संध्या छाया। इन नाटकों ने जबलपुर में धूम मचा दी। और इसी के साथ नादिरा जी का जबलपुर बार बार आना तय हो गया। तीसरे समारोह के समय विवेचना का गोआ दौरा हुआ। वहां उषा गांगुली अपने दल के साथ आई हुई थीं। उनसे बात हुई। परिणामस्वरूप तीसरे नाट्य समारोह में उषा गांगुली के दो नाटक हुए। रूदाली और कोर्ट मार्शल। इसी समारोह की एक और उपलब्धि थी फिरोजखान निर्देशित नाटक आल द बेस्ट। इस नाटक ने दर्शकों को हंसा हंसा के लोटपोट कर दिया। यह अकेला नाटक तरंग प्रेक्षागृह में हुआ था।
इस दौरान नाट्य समारोह की दर्शक संख्या बढ़ चुकी थी। इसीलिए चौथे समारोह के समय राष्टीय नाट्य समारोह का आयोजन शहीद स्मारक से उठकर मानस भवन आ गया। इस साल सन् 1997 में हबीब तनवीर का नाटक वसंत ऋतु का अपना कामदेव का सपना नाटक मंचित हुआ। इसी साल पहली बार अरविंद गौड़ का नाटक फाइनल साल्यूशंस मंचित हुआ। सन् 1998 में पंाचवें समारोह में अरविंद गौड़ का नाटक एक मामूली आदमी बहुत पसंद किया गया वहीं नादिरा बब्बर के नाटक दिल ही तो है ने अपार प्रशंसा पाई। इसी वर्ष अनिलरंजन भौमिक, इलाहाबाद का नाटक मंथन पहली बार जबलपुर में हुआ। छठवें समारोह में पहले दिन अरूण पांडे निर्देशित नाटक और अंत में प्रार्थना में आर एस एस के लोगों ने हमला कर दिया और बम फोड़े, कुर्सियां चलाईं। इस सबके बावजूद दर्शक रूके रहे और नाटक पूरा हुआ। विवेचना के कलाकारों के इस दमखम और समर्पण की बहुत तारीफ हुई। इसी साल नादिरा बब्बर का बहुत लोकप्रिय नाटक सकुबाई हुआ।
सातवें समारोह की खासियत यह रही कि यह समारोह तरंग में आयोजित हुआ। इसमें बलवंत ठाकुर के बच्चों के नाटक आप हमारे हैं कौन ने अद्भुत रंग जमाया। इस साल नादिरा बब्बर के नाटक संध्या छाया का दूसरा मंचन हुआ। पहली बार सन् 1995 में यह नाटक हो चुका था। इसी साल दयाशंकर की डायरी का मंचन हुआ जिसमें आशीष विद्यार्थी का एकल अभिनय था। इस नाटक की इतनी प्रशंसा हुई कि दूसरे दिन शाम को इस नाटक का दूसरा मंचन आयोजित हुआ। आठवां रा ना समारोह 2001 फिर वापस मानस भवन में आयोजित हुआ। इसमें दो महत्वपूर्ण नाटक मंचित हुए। दर्पण मिश्रा के निर्देशन में शेर अफगन जिसमें सुनील सिन्हा ने कमाल का अभिनय किया था। अरविंद गौड़ का नाटक वारेन हेस्टिंग्ज का सांड़ बहुत सराहा गया। इसे देखने के लिए उच्च न्यायालय के अनेक न्यायाधीश आए। नवमें समारोह में सन् 2002 नाट्य समारोह पुनः तरंग प्रेक्षागृह पंहुच गया और तबसे अब तक वहीं आयोजित हो रहा है। इस समारोह में लिटिल बैले टुप का बैले पंचतंत्र मंचित हुआ। इसी समारोह में नादिरा बब्बर का नाटक बेगम जान मंचित हुआ जो बहुत सराहा गया।
दसवां समारोह 2004 में हुआ जिसमें बलवंत ठाकुर का बच्चों का दूसरा नाटक उसके हिस्से की धूप कहां है के मंचन ने दर्शकों को गहरे तक प्रभावित किया। इसी समारोह में अरविंद गौड़ का नाटक माधवी जिसमें राशि बनी का एकल अभिनय था बहुत सराहा गया। 2005 में हुए ग्यारहवें राष्टीय नाट्य समारोह में विजय कुमार का नाटक ये आदमी ये चूहे मंचित हुआ। अनिल रंजन भौमिक इलाहाबाद का नाटक बाल भगवान आज भी याद किया जाता है। इस समारोह में अजय कुमार का नाटक बड़ा भांड़ तो बड़ा भांड़ प्रभावशाली था। 2006 में हुए बारहवें समारोह में जयपुर का नाटक चंपाकली का राम रूपैया बहुत भाया वहीं देवेन्द्रराज अंकुर का नाटक संक्रमण पहली बार मंचित हुआ। तेरहवें समारोह में सन् 2006 में विवेचना का नाटक मायाजाल मंचित हुआ। इस साल रिकॉर्ड सात नाटक मंचित हुए। इसमें देवेन्द्रराज अंकुर का नाटक हमसे तुमसे प्यार करेगा कौन और अनिल भौमिक का नाटक असमंजस बाबू बहुत चर्चित हुए। असमंजस बाबू का शो रविवार की सुबह 10 बजे रखा गया और भारी संख्या में दर्शक आए।
चौदहवां समारोह 2007 में आयोजित हुआ जिसमें पहले दिन विवेचना का नाटक मानबोध बाबू मंचित हुआ। इस समारोह में पहली बार दिनेश ठाकुर की भागीदारी हुई। उनका नाटक हम दोनों दर्शकों को बहुत पसंद आया। इसी समारोह में जे पी सिंह दिल्ली का नाटक अर्जेंन्ट मीटिंग भी अच्छा जमा। पन्द्रहवां समारोह 2008 में आयोजित हुआ जिसमें विवेचना का नाटक सूपना का सपना मंचित हुआ। पहले और दूसरे दिन मानव कौल के दो नाटक इल्हाम और शक्कर के पांच दाने मंचित हुए। दूसरे दिन अलखनंदन का नाटक चारपाई और चौथे दिन अरविंद गौड़ का नाटक अनसुनी मंचित हुआ। अंतिम दिन सुबह 10 बजे आपरेशन थ्री स्टार का मंचन हुआ। विवेचना का सोलहवां राष्टीय नाट्य समारोह 2009 मंे आयोजित हुआ जिसमें विवेचना का नाटक मित्र पहले दिन मंचित हुआ। दूसरे दिन महमूद फ़ारूखी की दास्तानगोई हुई। तीसरे दिन बंसी कौल का नाटक तुक्के पे तुक्का मंचित हुआ। चौथे दिन टॉम आल्टर का नाटक मिर्जा गालिब मंचित हुआ। पांचवें और अंतिम दिन रंजीत कपूर का नाटक अफवाह मंचित हुआ।
विवेचना का सत्रहवां नाट्य समारोह आगामी 27 अक्टूबर से 31 अक्टूबर 2010 तक आयोजित है। इसमें पहले दिन विवेचना का नया नाटक मौसाजी जैहिन्द मंचित होगा। दूसरे दिन त्रिपुरारी शर्मा के निर्देशन में रूप अरूप का मंचन होगा। तीसरे दिन बलवंत ठाकुर का नाटक घुमाई मंचित होगा। चौथे दिन हबीब तनवीर का नाटक चरण दास चोर मंचित होगा। अंतिम दिन नादिरा बब्बर का नाटक यार बना बडी मंचित होगा।

विवेचना का सत्रहवां राष्ट्रीय नाट्य समारोह 2010

विवेचना का सत्रहवां राष्ट्रीय नाट्य समारोह 2010
मध्यप्रदेश की जानी मानी सांस्कृतिक संस्था विवेचना, जबलपुर का सत्रहवां राष्ट्रीय नाट्य समारोह आगामी 27 अक्टूबर से 31 अक्टूबर 2010 तक आयोजित है। इस समारोह की श्रंखला 1994 से शुरू हुई थी जब स्व हबीब तनवीर ने पहले समारोह का उद््््््घाटन किया था और ’देख रहे हैं नैन’ का मंचन हुआ था। पहले ही समारोह में स्व बा व कारंत का ’बाबूजी’ हुआ जो आज सोलह साल बाद भी दर्शकों को याद है। पहले ही समारोह में बंसी कौल का वह जो अकसर झापड़ खाता है’ और सतीश आलेकर निर्देशित ’महानिर्वाण’ भी मंचित हुए थे। इस सत्रह सालों में देश के अधिकांश जाने माने निर्देशक जबलपुर आ चुके हैं और अपने यादगार नाटकों का मंचन कर चुके हैं। नादिरा बब्बर, दिनेश ठाकुर, मानव कौल, उषा गांगुली, देवेन्द्रराज अंकुर, रंजीत कपूर, सतीश आलेकर, अरविंद गौड़, अलखनंदन, लईक हुसैन, अनिलरंजन भौमिक आदि के नाटक हो चुके हैं। विवेचना के विगत सोलह समारोहों में अब तक 90 नाटक मंचित हो चुके हैं।
विवेचना के सत्रहवें राष्ट्रीय नाट्य समारोह में इस बार प्रथम दिन विवेचना जबलपुर वसंत काशीकर के निर्देशन में ’मौसाजी जैहिन्द’ मंचित होगा जो उदयप्रकाश की कहानी पर आधारित है। दूसरे दिन 28 अक्टूबर को त्रिपुरारी शर्मा के निर्देशन में ’रूप अरूप’ का मंचन होगा जो नौटंकी में काम करने वाले स्त्री और पुरूष के बीच के द्वंद्व पर आधारित है। तीसरे दिन बलवंत ठाकुर जम्मू के निर्देशन में ’घुमाई’ नाटक मंचित होगा। डोगरी भाषा का यह लोकनाटक अभी अभी यूरोप के अनेक देशों में मंचित हुआ है। चौथे दिन स्व हबीब तनवीर का नाटक ’चरणदास चोर’ मंचित होगा। पांचवें दिन 31 अक्टूबर को एकजुट मुम्बई द्वारा नादिरा बब्बर के निर्देशन में ’यार बना बडी’ मंचित होगा। इस पंाच दिवसीय नाट्य समारोह में पंकज दीक्षित के कोलाज, रेखाचित्रांे और कविता-कहानी पोस्टर की प्रदशनी भी लगेगी। त्रिपुरारी शर्मा, बलवंत ठाकुर और नादिरा बब्बर अपने रंग अनुभव और रंगकर्म पर बातचीत करेंगे। प्रतिदिन नाटक से पहले प्लेटफॉर्म प्रस्तुतियों में माइम, नुक्कड़ नाटक, एकल प्रस्तुतियां और लोकनृत्य भी मंचित होंगे। पुस्तक प्रदर्शनी आयोजित किए जाने के प्रयास किये जा रहे हैं।

विवेचना का नाट्य शिविर

विवेचना जबलपुर द्वारा 11 सितंबर 2010 से नाट्य शिविर का आयोजन किया। यह कई मायनों में अनोखा नाट्य शिविर है। इसमें अखबारों के माध्यम से शिविर में शामिल होने के लिए नाम आमंत्रित किए गए। विशेषता यह थी कि इस शिविर में शामिल होने के लिए छोटे बच्चों को छोड़कर हर उम्र के व्यक्ति को आमंत्रित किया गया। परिणामस्वरूप 14 वर्ष के किशोर से लेकर 71 वर्षीय बुजुर्ग ने भी इस शिविर में शामिल होने के लिए आवेदन दिया। इस शिविर में शामिल होने के लिए पांच घरेलू महिलाएं भी आईं।
शिविर का उद्घाटन सिद्धिबाला बोस लाइब्रेरी एसोसियेशन के अध्यक्ष सुब्रत पॉल द्वारा किया गया। श्री पॉल ने प्रशिक्षणार्थियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि जबलपुर में नाटकों के संवर्धन में सिटी बंगाली क्लब की बड़ी भूमिका रही है। उन्होंने विवेचना के वर्कशॉप हेतु यथासंभव सहयोग का आश्वासन दिया। यह शिविर सिटी बंगाली क्लब के कक्ष में आयोजित किए। श्रीमती रूपांजलि बैनर्जी ने सभी प्रशिक्षणार्थियों से नाटक के बारे में अधिकाधिक पढ़ने और सीखने का अनुरोध किया।
विवेचना के सचिव हिमांशु राय ने शिविर के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि पिछले दो वर्षाें में विवेचना ने राष्टीय नाटय विद्यालय के सहयोग से नाट्य शिविर आयोजित किए हैं। इस वर्ष यह शिविर आयोजित नहीं किया जा सका। इसीलिए इस शिविर का आयोजन किया जा रहा है। इस शिविर की विशिष्टता यह है कि इसमें हर उम्र का व्यक्ति हिस्सा ले सकता है। जबलपुर शहर में लाखों लोग रहते हैं लेकिन रंगकर्म से बहुत कम लोग जुड़े हैं। हम चाहते हैं कि वो तमाम लोग जो अभिनय गायन वादन या थियेटर की किसी भी विधा में रूचि रखते हैं थियेटर से जुड़ें। इसीलिए इस शिविर में शामिल होने के लिए कोई शर्त नहीं रखी गई है। बहुत से लोग जो गायन वादन या नृत्य आदि सीखे हुए होते हैं पर मंच पर उतरने का मौका नहीं हासिल कर पाते। विवेचना के इस शिविर के बहाने बहुत से लोगों ने यह अवसर हासिल किया कि वे प्रशिक्षण भी प्राप्त करें और मंच पर भी उतरें।
विवेचना के इस निःशुल्क शिविर में 37 प्रतिभागी शामिल हुए। इनमें 7 छात्राएं और घरेलू महिलाएं थीं। एक महिला गायन में विधिवत प्रशिक्षित हैं। शिविर का समय ऐसा रखा गया कि नौकरी पर जाने वाले लोग बिना छुट्टी लिये शिविर में हिस्सा ले सकें। शिविर में प्रतिदिन थियेटर व्यायाम, थियेटर गेम्स और इम्प्रोवाइजेशन के सत्र रखे गये जिनके बाद नाट्य विधा पर कक्षा होती थी जिसमें प्रतिभागियों को नाटक की जरूरी बारीकियां, लाइट साउंड, संगीत, नृत्य, मेकअप आदि की जानकारी दी गई। कुछ समय बाद जब प्रतिभागी खुलने लगे और नाट्य संसार से उनका परिचय हो गया तो नाट्य पाठ का सिलसिला शुरू किया गया। अनेक नाटकों का पठन किया गया। यह शिविर प्रारंभ होने पर ही घोषित कर दिया गया था कि इस शिविर में एक नाटक भी तैयार किया जाएगा जिसे विवेचना के सत्रहवें राष्टीय नाट्य समारोह में मंचित किया जाएगा। इसके लिये निर्देशक वसंत काशीकर ने उदयप्रकाश की कहानी मौसाजी का नाट्य रूपांतर किया। और मौसाजी जैहिन्द के नाम से नाटक तैयार हुआ। इस नाटक की तैयारी के दौरान नाटक की बारीकियों का ज्ञान प्रतिभागियों को दिया गया। नाटक में युवाओं और महिलाओं ने विशेष उत्साह से काम किया।
विवेचना द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित नाट्य शिविरों की श्रृंखला में यह शिविर सर्वाधिक सफल शिविर माना जा सकता है। इस शिविर के परिणाम उत्साहवर्धक रहे और शामिल प्रतिभागी विवेचना के नाट्यदल में शामिल हुए।

बंगाल में होता है राजनैतिक चेतना का रंगमंच - उषा गांगुली


विवेचना, जबलपुर और जबलपुर बंगाली एसोसियेशन के तत्वावधान में पश्चिम बंग नाट्य अकादमी कोलकाता के सहयोग से आयोजित चार दिवसीय बांगला नाट्य समारोह के अंतिम दिन 19 सितंबर 2010 को प्रातः 10 बजे विवेचना द्वारा ’’ बंगाल का रंगपरिदृश्य’’ विषय पर एक गोष्ठी आयोजित की गई। गोष्ठी को प्रसिद्ध नाट्य निर्देशक उषा गांगुली और चंदन सेन ने संबोधित किया।
उषा जी ने कहा कि बंगाल मंे छोटे छोटे गांवों और कस्बों में बहुत गंभीरता से रंगकर्म होता है। नौजवान लोग नए नए प्रयोग करते हैं। बंगाल में करीब 3500 नाट्य संस्थाएं हैं। करीब एक लाख रंगकर्मी नाटक से जुड़े हुए हैं। भारत में महाराष्ट और बंगाल का रंगमंच सबसे पुराना और स्थापित है। महाराष्ट में रंगमंच सामाजिक समस्याओं को बहुत अच्छे से उठाता है। वहीं बंगाल का रंगमंच राजनैतिक रूप से बहुत जाग्रत है। महाराष्ट का रंगमंच प्रोड्यूसर केन्द्रित है। प्रोड्यूसर जैसा चाहता है वैसा नाटक होता है। नवंबर से जनवरी माह तक बंगाल में सैकड़ों नाट्य उत्सव और मंचन होते हैं। छोटे छेाटे ग्रुप मंे भी अद्भुत मैनेजमेंट, अभिनय, रिहर्सल और मंचन की व्यवस्थाएं होती हैं। उन्होंने विवेचना के नाट्य शिविर में शामिल प्रशिक्षुओं से कहा कि वे पूरे समर्पण से नाटक सीखें। नाटक सचाई सामने लाता है इसीलिए नाटक खबर नहीं बनता। नए लोग नाटक में शामिल होते हैं यह जानते हुए भी कि नाटक से कुछ नहीं मिलता। पर सीखना चाहते हैं। पूरे देश में करीब 1 करोड़ रंगकर्मी हैं। ये रोज कुछ नया रचते हैं। उनके काम में ताजगी होती है। नई पौध में नई चेतना होती है। एक साजिश के तहत यह खबर नहीं बनती क्योंकि थियेटर उधेड़ता है। सच्चाई को पेश करता है। आज बाजार हर जगह हावी है। लेकिन नाटक बाजार से हटकर है। जो नाटक और नाटक करने वाले बाजार का हिस्सा बनते हैं उनका कोई रचनात्मक योगदान नहीं रहता। थियेटर बाजार के साथ समझौता नहीं करता। उन्होंने किरण बेदी नाम लेकर कहा कि उनके काम के लिए हमारे मन में बहुत सम्मान है पर उन्हें साबुन पाउडर बेचने की क्या जरूरत है? यह बाजार से समझौता है।
प्रसिद्ध नाट्य लेखक और निर्देशक चंदन सेन ने कहा कि थियेटर का संपर्क जीवन और समाज की सच्चाई से है इसीलिए थियेटर हमेशा जीवित है। उन्होंने बताया कि पश्चिम बंग नाट्य अकादमी जैसी अकादमी कहीं नहीं है जो कला के हर क्षेत्र में कार्य करती है। उत्सव आयोजित करती है। प्रशिक्षण शिविर आयोजित करती है। यह वर्ष रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150 वीं जयंती का है। इस अवसर पर पूरे देश में आयोजन हो रहे हैं। बंगाल मंे हर वर्ष सैकड़ों नए नाटक लिखे जा रहे हैं। नए नए प्रयोग हो रहे हैं। गौतम हालदार, सपन मुकर्जी, कौशिक सेन, सुरंजना, सीबा मुकर्जी जैसे अनेक युवा नाटककार और निर्देशक सामने आए हैं जिनके काम को सराहा गया है। राष्टीय नाट्य विद्यालय दिल्ली द्वारा आयोजित भारत रंग महोत्सव में केवल कलकत्ता से ही 7-8 नाटकों का चयन हो रहा है।
पश्चिम बंग नाट्य अकादमी के सदस्य सचिव सौरव कुमार वासु ने कहा कि कलाकार बाजार से प्रभावित न हों इसीलिए अकादमी द्वारा कलाकारों के प्रशिक्षण और मंचन की सभी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। नाटकों के लिए पूर्ण सुसज्जित प्रेक्षागृह केवल चार सौ रूपयें में उपलब्ध कराया जाता है। किताबें प्रकाशित की जाती हैं। अकादमी के सभी कार्यकारिणी सदस्य नाटक के क्षेत्र से हैं।
गोष्ठी का संचालन सचिव हिमांशु राय व वसंत काशीकर ने किया। आभार प्रदर्शन बांके बिहारी ब्यौहार ने किया।

Wednesday, February 2, 2011

जबलपुर में पहली बार बांगला नाट्य उत्सव का आयोजन


जबलपुर में पहली बार बांगला नाट्य उत्सव का आयोजन हुआ। विवेचना जबलपुर और जबलपुर बंगाली एसोसियेशन ने मिलकर पश्चिम बंग नाट्य अकादमी के सहयोग से इस समारोह को संयोजित किया। पश्चिम बंग नाट्य अकादमी पश्चिम बंगाल सरकार की सरकार की एक इकाई है। नाट्य अकादमी द्वारा हर वर्ष बंगाल के बाहर किसी शहर में बंगला नाटकों के समारोह का आयोजन किया जाता है। इस वर्ष विवेचना के विशेष आग्रह पर इसे जबलपुर में आयोजित किया गया। जबलपुर के सभी बंगाली क्लब और काली बाड़ी संगठन जो जबलपुर बंगाली एसोसियेशन के अंतर्गत संगठित हैं इसमें शामिल हुए। 16 सितंबर से 19 सितंबर 2010 तक आयोजित इस चार दिवसीय नाट्य समारोह का उद्घाटन जबलपुर के मेयर श्री प्रभात साहू, बंगाल के वरिष्ठ निर्देशक मनोज मित्रा व चन्दन सेन ने किया। इस अवसर पर पश्चिम बंगाल सरकार के संस्कृति सचिव श्री सोमनाथ मुखोपाध्याय ने नाट्य अकादमी की गतिविधियों की जानकारी दी। इस समारोह में चार नाटक मंचित किए गए।
नाट्य समारोह के प्रथम दिन जबलपुर के बंगला कलाकारों ने तपन चक्रवर्ती के निर्देशन में ’जनवरी 64’ नाटक का मंचन किया। कोलकाता में जनवरी 1964 में हुए हिन्दू मुस्लिम दंगों की पृष्ठभूमि में यह नाटक स्कूल की अध्यापिका द्वारा एक मुस्लिम युवक के प्राणों की रक्षा की कहानी है। दर्शकों की भारी उपस्थिति के बीच नाटक को बहुत सराहना मिली।
नाट्य समारोह के दूसरे दिन बंगाल के वरिष्ठ और सम्मानित निर्देशक मनोज मित्रा का नाटक ’’ साजानो बागान’’ मंचित हुआ। साजानो बागान जमींदार द्वारा गरीब किसान की जमीन ह्रड़प लेने की साजिशों की कहानी है। नाटक में जमींदार के हथकंडे और जमीन हड़पने की हवस इतनी प्रबल रहती है कि मर कर भी वह भूत बनकर जमीन के इर्दगिर्द ही मंडराता है। समय परिस्थितियों के मुताबिक नाटक में अनेक मोड़ होते हैं पर अंत में जीत गरीब बान्छाराम की ही होती है। बांछाराम के रूप में निर्देशक मनोज मित्र स्वयं थे। उनके अभिनय को देखना एक निराला अनुभव था। नाटक का सैट व लाइट बहुत प्रभावशाली थी। इस अवसर पर बोलते हुए मनोज मित्र ने कहा कि जबलपुर में वे पहली बार आए हैं और यहां विवेचना व बंगाली समाज द्वारा आयोजित नाट्य समारोह बहुत अच्छी कोशिश है। आज नाटक का समय बहुत अच्छा नहीं है। फिल्म और टी वी के माध्यम बहुत प्रभावी हैं। पर नाटक हमेशा चलते रहेंगे। जरूरत है जबलपुर में किए गए नाट्य समारोह जैसे प्रयासों की।
समारोह के तीसरे दिन नाटककार, निर्देशक चंदन सेन के नाटक ’’ हासे आश्रु नोदी ’’ का मंचन किया गया। नाटक की शुरूआत एक ऐसे व्यक्ति से होती है जो कभी कारखाने में कैशियर हुआ करता था। कारखाना बंद होने पर वह बेरोजगार हो जाता है। परिवार वालों को भरण पोषण करने के लिए वह बड़े बड़े लोगों की खुशामद करता है और बदले में मिली बख्शीश से उसका घर चलता है। उसकी एक बेटी भी है जो कहीं नौकरी करती है। घर वाले नहीं जानते कि वह कहां नौकरी करती है। दरअसल वह घर से निकलकर बाहर युवकों को आकर्षित करती है और बाद में हल्ला मचाकर पकड़वा देने की धमकी देकर रूपये एंेठती है। इसी बीच उसकी मुलाकात गांव के एक गरीब लड़के से होती है जो उसे बहुत चाहता है। एक दिन लड़की का पिता लड़की को रंगे हाथों पकड़ लेता है। लड़की को अपने किए का बहुत पछतावा होता है।
नाटक में भव्य सैट और लाइट का अनोखा प्रयोग किया गया। नाटक मंे पूरे समय जिज्ञासा और रूचि बनी रही। नाटक को और चंदन सेन को बहुत सराहना मिली।
नाट्य समारोह के अंतिम दिन उषा गांगुली के निर्देशन में ’मुक्ति’ नाटक का मंचन किया गया। उषा जी मूलतः हिन्दी नाटक ही करती हैं। मुक्ति उनका विशिष्ट बंगला नाटक है। नारी आखिर कब तक बंधनों में बंधकर रहेगी ? क्या शोषण ही उसकी नियति है ? नाटक की मुख्य पात्र है मुक्ति जो दूसरों के लिए जीती है। कोई उसे बहन, कोई बुआ, कोई मौसी बबनाकर अपना अपना काम निकालते हैं लेकिन मुकित को मुक्ति कैसे मिले वह अपने लिए क्या सपने संजोए ये किसी को फिक्र नहीं है। एक घर मंे नन्हीं बालिका नीना से उसकी मुलाकात होती है। दोनों में गहरी दोस्ती हो जाती है। नीना मुक्ति को समझाती है। उसे उसकी अपनी ताकत का एहसास कराती है। मुक्ति अपने किंए काम का पैसा लेकर जाने लगती है। घर के लोग उससे तब भी यही पूछते हैं कि इस उम्र में वह क्या लाल जोड़ा पहनने जा रही है ? नाटक के अंत में मुक्ति इस समाज से एक प्रश्न पूछती है कि जीवन की इस संाझ में क्या उसे अपनी इच्छा से जीने का हक नहीं है ? वो कहां जाए ?
दर्शकों से बात करते हुए उषा जी ने कहा कि थियेटर में काम करना उन्हें संतोष देता है। थियेटर हमें तात्कालिक प्रसिद्धि नहीं देता लेकिन व्यक्ति और समाज की समस्याओं को सम्प्रेषित करने का यह सशक्त माध्यम है। उनका सौभाग्य है कि वो थियेटर से जुड़ीं जिसके कारण उन्हें मानव जीवन के सतरंगे पहलुओं को अध्ययन करने का मौका मिला। उनके नाट्य दल ’रंगकर्मी’ 200 कलाकार हैं जो निरंतर सृजन करने में उनकी मदद करते हैं। होली, रूदाली, महाभोज, कोर्ट मार्शल, मुक्ति, काशीनामा, उनके प्रसिद्ध नाटक हैं।
जबलपुर में बंगला समाज में यह नाट्य समारोह एक अलख जगा गया है। बड़ी संख्या में नए पुराने दर्शक नाटक देखने पंहुचे और यह विश्वास दिलाया कि अगला समारोह और ज्यादा सफल होगा। विवेचना और जबलपुर बंगाली एसोसियेशन ने दर्शकों का आभार व्यक्त किया।

Tuesday, December 7, 2010

परसाई स्वतंत्र भारत का असली चेहरा - प्रो ज्ञानरंजन



’’परसाई स्वतंत्र भारत का असली चेहरा हैं। परसाई मुख्यतः साहित्य और जीवन निर्माता रहे। उन्होंने पता नहीं कितनों का निर्माण किया। असल में व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्र्रिया बहुत ही जटिल तथा अमूर्त भी होती है। परसाई का समग्र रूप अनूठा था। उनमें चपल विनोदवृत्ति थी और ठाठदार हास्य। उन्हें समाज के हर वर्ग का प्यार मिला। प्यार और भक्ति के समुद्र के बीच परसाई ने अपनी ठेठ खड़ी बोली और वस्तु विचार को निर्मित किया।’’ ये विचार प्रसिद्ध कहानीकार प्रो ज्ञानरंजन नेे विवेचना जबलपुर द्वारा परसाई जन्मदिवस के अवसर पर आयोजित ’परसाई प्रसंग’ में प्रमुख वक्ता के रूप में व्यक्त किये।
इस अवसर पर विवेचना के सचिव हिमांशु राय ने परसाई जी के संस्मरणों के अंशों का पाठ किया। संस्मरणों का यह संकलन परसाई जी की ही जुबानी परसाई के परसाई बनने की कहानी कहता है। परसाई जी के बचपन में परिवार में घटी घटनाएं, दुर्घटनाएं, उनके शिक्षक और परिवार का विवरण के कारण उपस्थित श्रोता नए सिरे से परसाई जी को जान सके।
इस अवसर पर भूतपूर्व सांसद रामेश्वर नीखरा ने अपने छात्र काल को याद किया जब वो जबलपुर विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष थे और परसाई जी का सान्निध्य और मार्गदर्शन उन्हें मिला। प्रो अरूणकुमार ने कहा कि परसाई जी का महान होने के मानकों से कोई रिश्ता नहीं है। वे बीसवीं सदी के सर्वाधिक महत्वपूर्ण रचनाकार थे। वे जनता के लेखक थे पर जनप्रिय नहीं थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो हनुमान वर्मा ने अपने व्यक्तिगत संस्मरणों के बहाने परसाई जी को याद किया।
कार्यक्रम की शुरूआत में हिमांशु राय ने बताया कि सन् 1961 में किन परिस्थितियों में परसाई जी, प्रो ताम्हनकर आदि ने मिलकर विवेचना का गठन किया। परसाई जी केवल लेखक नहीं थे। वे समाज के सजग और सक्र्रिय सदस्य थे। राजनीति में वे सक्रिय हस्तक्षेप रखते थे और निर्भीकता से बोलते लिखते थे। उन्होंने जीवन भर कोई समझौता नहीं किया। कार्यक्रम का संचालन बांके बिहारी ब्यौहार ने किया।

कार्यक्रम के दूसरे चरण में परसाई जी की प्रसिद्ध रचना ’’शवयात्रा का तौलिया’’ का मंचन किया गया। विवेचना के वरिष्ठ कलाकार संजय गर्ग ने अपने एकल अभिनय से दर्शकों को प्रभावित किया। संगीत संचालन विजयकुमार ने किया।

Friday, December 3, 2010

जबलपुर में ’मित्र’



जबलपुर में ’मित्र’
30 मई 2010 को विवेचना ने जबलपुर में ’मित्र’ नाटक का मंचन किया। विवेचना का यह नाटक बहुत प्रसिद्ध हुआ है और जबलपुर में दर्शकों की मंाग पर इसे मंचित किया गया। यह मंचन विवेचना ने स्वयं आयोजित किया। मानस भवन के मंच पर आयोजित इस नाटक को देखने के लिए बड़ी संख्या में दर्शक आए और नाटक को खूब सराहा। नाटक के लिए बहुत तैयारी के साथ एक भव्य सैट लगाया गया और दो दिनों की मेहनत से विवेचना के कलाकारों ने इसे संवारा। वसंत काशीकर ने मुख्य अभिनेता और निर्देशक की जिम्मेदारी पूरी तन्मयता से संभाली। मिसेज रूपवते की भूमिका में शैरी कक्कड़ ने प्रभावशाली अभिनय किया। रविवार होने के कारण बड़ी संख्या में एडवोकेट्स, डॉक्टर्स और प्रोफेशनल्स नाटक देखने आए।