Tuesday, December 7, 2010

परसाई स्वतंत्र भारत का असली चेहरा - प्रो ज्ञानरंजन



’’परसाई स्वतंत्र भारत का असली चेहरा हैं। परसाई मुख्यतः साहित्य और जीवन निर्माता रहे। उन्होंने पता नहीं कितनों का निर्माण किया। असल में व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्र्रिया बहुत ही जटिल तथा अमूर्त भी होती है। परसाई का समग्र रूप अनूठा था। उनमें चपल विनोदवृत्ति थी और ठाठदार हास्य। उन्हें समाज के हर वर्ग का प्यार मिला। प्यार और भक्ति के समुद्र के बीच परसाई ने अपनी ठेठ खड़ी बोली और वस्तु विचार को निर्मित किया।’’ ये विचार प्रसिद्ध कहानीकार प्रो ज्ञानरंजन नेे विवेचना जबलपुर द्वारा परसाई जन्मदिवस के अवसर पर आयोजित ’परसाई प्रसंग’ में प्रमुख वक्ता के रूप में व्यक्त किये।
इस अवसर पर विवेचना के सचिव हिमांशु राय ने परसाई जी के संस्मरणों के अंशों का पाठ किया। संस्मरणों का यह संकलन परसाई जी की ही जुबानी परसाई के परसाई बनने की कहानी कहता है। परसाई जी के बचपन में परिवार में घटी घटनाएं, दुर्घटनाएं, उनके शिक्षक और परिवार का विवरण के कारण उपस्थित श्रोता नए सिरे से परसाई जी को जान सके।
इस अवसर पर भूतपूर्व सांसद रामेश्वर नीखरा ने अपने छात्र काल को याद किया जब वो जबलपुर विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष थे और परसाई जी का सान्निध्य और मार्गदर्शन उन्हें मिला। प्रो अरूणकुमार ने कहा कि परसाई जी का महान होने के मानकों से कोई रिश्ता नहीं है। वे बीसवीं सदी के सर्वाधिक महत्वपूर्ण रचनाकार थे। वे जनता के लेखक थे पर जनप्रिय नहीं थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो हनुमान वर्मा ने अपने व्यक्तिगत संस्मरणों के बहाने परसाई जी को याद किया।
कार्यक्रम की शुरूआत में हिमांशु राय ने बताया कि सन् 1961 में किन परिस्थितियों में परसाई जी, प्रो ताम्हनकर आदि ने मिलकर विवेचना का गठन किया। परसाई जी केवल लेखक नहीं थे। वे समाज के सजग और सक्र्रिय सदस्य थे। राजनीति में वे सक्रिय हस्तक्षेप रखते थे और निर्भीकता से बोलते लिखते थे। उन्होंने जीवन भर कोई समझौता नहीं किया। कार्यक्रम का संचालन बांके बिहारी ब्यौहार ने किया।

कार्यक्रम के दूसरे चरण में परसाई जी की प्रसिद्ध रचना ’’शवयात्रा का तौलिया’’ का मंचन किया गया। विवेचना के वरिष्ठ कलाकार संजय गर्ग ने अपने एकल अभिनय से दर्शकों को प्रभावित किया। संगीत संचालन विजयकुमार ने किया।

1 comment:

  1. बहुत बढ़िया रपट है भाई ।

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