Wednesday, October 22, 2014

हास्य व्यंग्य से भरपूर है विवेचना का 20 वां राष्ट्रीय नाट्य समारोह

 विवेचना का बीसवां राष्ट्रीय नाट्य समारोह आगामी 23 अक्टूबर से 27 अक्टूबर 2013 तक तरंग प्रेक्षागृह, जबलपुर में आयोजित है। इस समारोह की खासियत यह है कि इस समारोह को खुशनुमा बनाने के लिए हास्य व्यंग्य से भरपूर नाटकों का चुनाव किया गया है। इस नाट्य समारोह की दूसरी खासियत यह है कि इसमें भारत के चार महान नाटककारों के नाटक मंचित होने जा रहे हैं। बादल सरकार, जयंत दलवी, सुरेन्द्र वर्मा और विजय तेंदुलकर जैसे महान नाटककारों के नाटकों से सजा यह नाट्य समारोह दर्शकों को बहुत पसंद आएगा।
पहले दिन 23 अक्टॅूबर को आयोजक संस्था विवेचना के नाटक ’बड़ी बुआजी’ का मंचन होगा। बादल सरकार का लिखा यह नाटक पिछले 30 सालों से दर्शकों को गुदगुदा रहा है। एक घर में नाटक की रिहर्सल चल रही है। घर मालिक की लड़की अनु उसकी मुख्य पात्र है। तभी उसकी बड़ी बुआ जी आ पंहुचती हैं जो नाटकों की घनघोर विरोधी हैं। अब पूरी टीम यह छुपाने में लग जाती है कि यहां नाटक नहीं हो रहा है। और घटनाएं कुछ ऐसी घटती हैं कि बुआजी को पता चलता जाता है।
समारोह का दूसरा नाटक जयंत दलवी का प्रसिद्ध नाटक ’अरे शरीफ लोग’ है। इस नाटक में हास्य के माध्यम से आम आदमी के मन की ग्रंथियों को उघाड़ा है। एक चाल में चार अधेड़ उम्र के पड़ोसी रहते हैं। वहीं एक लड़की नये किरायेदार के रूप में आ पहुँचती है। चारों पड़ोसियों और उनकी पत्नियों की नोंकझोंक के बीच एक युवक तरह तरह की चालें चलता है जिससे सबका चरित्र उजागर होता है।
तीसरे दिन मुखातिब, मुम्बई द्वारा इश्तियाक आरिफ खान के लेखन और निर्देशन मेें मुम्बई के कलाकारों द्वारा ’द शैडो ऑफ ऑथेलो’ का मंचन किया जाएगा। एक गांव के युवक ’ओंकारा’ फिल्म देखकर यह विचार करते हैं कि अपने गांव में यह फिल्म बनाई जाए। उन्हें बताया जाता है कि यह फिल्म शेक्सपियर के नाटक ओथेलो पर आधारित है। तब दिल्ली से निर्देशक बुलाकर गांव के लोग ऑथेलो नाटक करते हैं। इस नाटक की कहानी के अंदर से गांव के लोगों की कहानी बनने लगती है। गांव के युवाओं में सभी फिल्मी अभिनय करना चाहते हैं। निर्देशक उनसे गंभीरता से ऑथेलो नाटक कराना चाहता है।  नाटक बहुत रोचक है।
चौथे दिन हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार सुरेन्द्र वर्मा का एक गंभीर उर्दू नाटक ’कैद-ए-हयात’ का मंचन दिल्ली से दानिश इकबाल की टीम करेगी। यह नाटक गालिब के जीवन के अंतिम दिनों की परेशानियों और क़ातिबा के प्रति उनके दुखांत प्रेम की गाथा है। यह नाटक श्रेष्ठ अभिनय, अद्भुत कथानक और उर्दू भाषा के लालित्य के लिए जाना जाता है।
पांचवें और अंतिम दिन विजय तेंदुलकर का प्रसिद्ध नाटक ’जात ही पूछो साधु की’ का मंचन स्व दिनेश ठाकुर के निर्देशन में ’अंक’ मुम्बई की टीम करेगी। पिछड़ी जाति के महीपत नाम के एक बेरोजगार युवक को बड़ी मेहनत के बाद गांव के एक कालेज में पढ़ाने की नौकरी इसलिए मिल जाती है कि उसके अलावा कोई उम्मीदवार ही नहीं था। अपनी नौकरी बचाए रखने के लिए महीपत तरह तरह के जतन करना पड़ते हैं। हर जगह उसकी जाति उसके आड़े आती है। सारे लोग उसकी नौकरी के पीछे पड़ जाते हैं। कालेज के मालिक की लड़की भी कॉलेज में भरती हो जाती है और महीपत के पीछे पड़ जाती है। इस नाटक में मुम्बई के फिल्म टी वी जगत के जाने माने कलाकार शिरकत करेंगे। यह नाटक हिन्दी का बहुत पसंदीदा हास्य नाटक है।
विवेचना के कलाकार और कला निर्देशक जहां बड़ी बुआ जी के पूर्वाभ्यास में लगे हुए हैं वहीं विवेचना के पदाधिकारी नाट्य समारोह की तैयारियों में जुटे हुए हैं। पिछले बीस सालों में विवेचना के नाट्य समारोह में जो भी दल जबलपुर आए हैं वे बहुत मधुर यादों और स्नेहपूर्ण आतिथ्य के साथ वापस गये हैं। विवेचना के नाट्य समारोह की तैयारी बहुत शिद्दत से की जाती है और सभी व्यवस्थाओं और प्रचार प्रसार का पूरा ध्यान रखा जाता है।

विवेचना द्वारा ’मिला तेज से तेज’ का मंचन


विवेचना संस्था द्वारा नाटकों के निरंतर मंचन के अंतर्गत 2 सितंबर 2013 सोमवार को संध्या 7.30 बजे नाटक मिला तेज से तेज का मंचन गया। नाटक का निर्देशन व आलेख संजय गर्ग का था। इसमें किशोर वय के कलाकारों ने सराहनीय कार्य किया। मंच पर पूरे समय उर्जा का संचार होता दिख रहा था।
यह नाटक सुभद्राकुमारी चौहान के जीवन पर आधारित है। सुभद्रा जी न केवल एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थीं वरन् इस शताब्दी की महत्वपूर्ण कवियत्री थीं। इससे कवि विरल हैं जिनकी कविताएं हर एक की जबान पर होती हों। हर हिंदी भाषी के लिए ’खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी’ बचपन मंे कविता शब्द से परिचय कराने वाली पहली पंक्ति हुआ करती है।
संजय गर्ग ने सुभद्रा जी के बचपन, फिर विवाह और विवाह के बाद बच्चों के लालन पालन के बीच विकसित होती हुई एक कवियत्री को अपनी प्रस्तुति में आकार दिया है। नाटक में बचपन के दृश्य बहुत भावनात्मक हैं। आज के यांत्रिक समय में ये दृश्य एक अलग ही प्रभाव पैदा करते हैं जिसमें भावनाओं और सादगी का अद्भुद सम्मिश्रण दिखता है। स्कूल के बच्चे इकठ्ठे होकर अपनी पाठ्यपुस्तक के गीत गाते हैं जो सभी सुभद्रा जी द्वारा लिखे गये हैं। नाटक में ’ कोयल काली काली है पर मीठी है इसकी बोली’, वो देखो मां आज खिलौने वाला फिर से आया है’, आओ प्रिय ऋतुराज मगर धीरे से आना, मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी, सभा सभा का खेल आज हम खेलेंगे दीदी आओ, ये कदम्ब का पेड़ अगर मां होता जमुना तीरे, नीम का पेड़ यद्यपि तू कड़ू , नहीं रंचमात्र मिठास, आदि कविताओं का सस्वर गायन बहुत रोचक है। इससे यह नाटक कहीं संगीत नाटक के पास जा बैठता है।
नाटक में जबलपुर के स्वतंत्रता संग्राम विशेष रूप से झंडा सत्याग्रह और सुभद्रा जी व उनके पति का बच्ची सहित जेल जाने के दृश्य हैं। उल्लेखनीय है कि सुभद्रा जी को पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी कहा जाता है। वे केन्ट बोर्ड जबलपुर में झंडा फहराते गिरफ्तार हुर्इ्रं थीं। नाटक में गांधी जी के जबलपुर प्रवास का भी दृश्य है जो अनोखा है और बहुत प्रभावशाली है। गांधी जी 3 दिसंबर 1933 को अछूतोद्धार आंदोलन के सिलसिले में जबलपुर  आए थे।
सुभद्रा कुमारी चौहान का गीत ’बुंदेले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी। दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। जैसी पंक्तियां हमेशा हमारे कानों में गंूजती रहती है। पाठ्यपुस्तकों में जो गीत है वो संपादित है जबकि दरअसल यह गीत बहुत बड़ा है। इतिहास को इतने सरल शब्दों में पिरोया गया है कि बचपन में पढ़ा यह गीत आज भी कंठस्थ है। जिन लोगों ने सुभद्रा जी को केवल इस गीत के माध्यम से जाना है उनके लिए सुभद्रा जी का संघर्षपूर्ण जीवन और साहित्यिक जीवन दोनों ही बहुत कुछ समझने की मांग करते हैं। ये गांधी का आंदोलन ही था जिसने लाखों महिलाओं को आजादी के आंदोलन में समेटा और उन्हें घर से बाहर निकालकर देश के लिए मरमिटने का संदेश दिया।
नाटक में सुभद्रा जी के पति लक्ष्मण सिंह चौहान का जब्तशुदा नाटक ’गुलामी का नशा’ से भी एक कविता ’चल दिये माता के बंदे जेल बंदे मातरम’ का गायन भी किया गया है।
नाटक में विभिन्न भूमिकाओं में आशीष नेमा, अली फैजल खां, अंशुल साहू, शेखर मेहरा, अक्षय ठाकुर, आयुष राय, संजीव विश्वकर्मा, ब्रजेन्द्र राजपूत, शिवेन्द्र सिंह, इंदु सूर्यवंशी, मुस्कान सोनी, शालिनी अहिरवार, श्रुति गुप्ता, श्रेया गुप्ता, सुजाता केसरवानी, मनीषा तिवारी, मनु कौशल ने अभिनय किया। तबले पर अक्षय ठाकुर, ढोलक पर अंकुश पसेरिया, हारमोनियम पर मुस्कान सोनी, रिज़वान अली खां रहे। इंदु सूर्यवंशी ने सुभद्रा जी के रोल में प्रभावशाली अभिनय किया। प्रकाश व्यवस्था जगदीश यादव की थी। नाटक के अंत में संजय गर्ग ने दर्शकों का आभार व्यक्त करते हुए जॉय स्कूल का आभार व्यक्त किया जहां इस नाटक का पूर्वाभ्यास हुआ।






Tuesday, October 21, 2014

बहुत कठिन है व्यंग्य लिखना: डा ज्ञान चतुर्वेदी

विवेचना का आयोजन - परसाई जन्मदिवस  
व्यंग्य पढ़ने और लिखने की तमीज़़






विवेचना, जबलपुर द्वारा हर साल की तरह इस साल भी 22 अगस्त को परसाई जन्मदिवस मनाया गया। कार्यक्रम के मुख्यअतिथि सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार डा ज्ञान चतुर्वेदी थे। नईदुनिया के जबलपुर संस्करण के संपादक श्री दिवाकर ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की।
कार्यक्रम के प्रारंभ में विवेचना के सचिव हिमांशु राय ने परसाई जन्मदिवस के बारे में कहा कि विवेचना द्वारा हर 22 अगस्त को परसाई जी का जन्मदिवस मनाया जाता है। लेखक जिस शहर में रहा हो वहां उसके मित्रों और पाठकों का उसे याद किया जाना जरूरी है।
लेखिका  इंदु श्रीवास्तव  ने परसाई जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक लेख पढ़ा।  इंदु जी ने बताया कि परसाई जी सिर्फ लेखक नहीं थे वरन् एक तरह के समाज सुधारक थे जो अपनी तीखी लेखनी से समाज को बदलने की कोशिश करते थे। वे अपने लेखन के लिए चरित्र आम लोगों में से तलाशते थे और उसी के बहाने वो अपनी बात कह जाते थे। उनकी कही बातें तीर की तरह चुभती थीं। उन्होंने अपने जीवन में बहुत कुछ झेला था। उनके ये जीवनानुभव ही उन्हें हर चरित्र के अंदर झांक सकने की शक्ति देते थे।
डा ज्ञान चतुर्वेदी ने अपने भाषण की शुरूआत में कहा कि मुझे मुख्यअतिथि बनने से बहुत डर लगता है। क्योंकि धीरे धीरे मुख्यअतिथि बनने की आदत सी बन जाती है फिर ये लगने लगता है कि भई सबको बुला रहे हो, हमंे भी बुलाओ। कर कमल हो जाते हैं। एक लेखक की सबसे बड़ी विडंबना यही हो सकती है कि उसके कर कमल हो जाएं। जो हाथ उसकी पूंजी हैं वे ही किसी काम के न रहें।
आगे बात करते हुए डा ज्ञान चतुर्वेदी ने कहा कि आज मेरा विषय ’व्यंग्य पढ़ने की तमीज़’ है। इससे मेरा तात्पर्य तमीज़ सिखाना नहीं है वरन् मेरा कहना ये है कि यदि मैं कोई बात कहना चाहता हूं और वो मैं अपने शब्दों के माध्यम से कह सका हूं तो मैं सफल हूं। दरअसल ये शीर्षक होना चाहिए ’व्यंग्य पढ़ने और लिखने की तमीज़’। पढ़ने की तमीज़ तो होना ही चाहिए पर साथ ही व्यंग्य लिखने की तमीज़’ भी होना चाहिए।
डा ज्ञान चतुर्वेदी ने कहा कि एक अच्छी व्यंग्य रचना किसे कहते हैं ? क्या है जिसके कारण हमें एक रचना अच्छी लगती है। एक पाठक हमारी रचना में अंततः क्या ढंूढता है। पाठक हमारी रचना में विचार तलाशता है। यदि आप व्यंग्यकार हैं तो आपकी रचना में व्यंग्य तो हो। व्यंग्य तो विचार से ही पैदा होता है। यदि आपके पास विचार ही नहीं है तो व्यंग्य कहां से पैदा होगा। इसीलिए जरूरी है कि हम समाज को समझें, समाज में रह रहे लोगों के दुख दर्द को जानें फिर डूब कर लिखें। जिस विचार ने तुम्हें नहीं पकड़ा वो दर्शक या पाठक को क्या पकड़ेगा।
एक अच्छी रचना की पहचान करने के लिए शास्त्र पढ़ना जरूरी नहीं है। व्यंग्य लिखना बहुत कठिन काम है। इसीलिए आप पायेंगे कि हिन्दी, उर्दू में व्यंग्यकार कितने हैं ? उन्होंने पाकिस्तान का जिक्र किया जहां शौकत थानवी की मृत्यु पर राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया। उन्होंने ब्रिटेन के हवाई अड्डे का भी उल्लेख किया जहां वे एक सम्मान लेने गये थे और हवाई अड्डे पर उन्हें रोक लिया गया और जब उन्होंने बताया कि वो एक व्यंग्यकार हैं तो उसने उन्हें बहुत सम्मान के साथ विदा किया।
उन्होंने कहा कि वे पेशे से एक डाक्टर हैं। वो दिनभर 100 के करीब मरीज देखते हैं। पर मरीज के इलाज के अलावा उनका उद्देश्य यह भी होता है कि बातों के दौरान मरीज को जाना जाए। वो हर मरीज से उसके मर्ज के अलावा उसके घर परिवार बाल बच्चों के बारे में पूछते हैं। इसीलिए हर रोज उनके पास पचासों कहानियां आती हैं। जीवन से रोज नया सीखना होता है। जब हम रोज नए अनुभवों से गुजरते हैं तब हम रोज नया लिख पाते हैं।
परसाई जी ने बहुत अच्छे कामों के साथ एक बुरा काम ये किया कि लेखकों की एक ऐसी पौध तैयार कर दी जिसे लगता है कि व्यंग्य लिखना बहुत सरल काम है। जिसे व्यंग्य पढ़ने की तमीज़ नहीं है वो व्यंग्य क्या लिखेगा। उन्होंने कहा कि मेरे कद में परसाई और शरद जोशी का कद शामिल है। न तो मैं उनसे अलग हूं और न उनसे बड़ा हूं। आप कुछ नहीं है यदि आपके पूर्वज आप में शामिल नहीं हैं।
कार्यक्रम के अध्यक्ष श्रीवत्स दिवाकर ने कहा कि आज साहित्य का नया पाठक नहीं बन रहा है। समाज एक कुंद समाज में तब्दील हो गया है जहां लोगों का आपस में मिलना जुलना बंद हो गया है। पहले शहर में कुछ अड्डे हुआ करते थे जहां लोग इकठ्ठे होकर गप्पें भी मारा करते थे और विचार विमर्श भी करते थे। यह एक सामाजिक परिवर्तन है जिसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। यह चिंताजनक है।
कार्यक्रम का संचालन बांकेबिहारी ब्यौहार ने किया। आभार प्रदर्शन राजेन्द्र दानी ने किया। आभार प्रदर्शन के बाद विवेचना के कलाकारों ने परसाई जी की रचना ’इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’ का मंचन किया। नाटक का निर्देशन तपन बैनर्जी ने किया। वरिष्ठ कलाकार सीता राम सोनी और तपन बैनर्जी ने इस नाटक में अभिनय किया।

दस दिन का अनशन का मंचन जॉय स्कूल में संपन्न



दस दिन का अनशन परसाई जी की वो कहानी है जो आज से 50 वर्ष पूर्व लिखी गई है लेकिन ऐसा लगता है मानो आज लिखी गई है। दस दिन का अनशन में हमारे आस पास के नेता, धर्म और राजनीति के खिलाड़ी सभी दिखाई पड़ते हैं। विवेचना ने इस नाटक के माध्यम से जनचेतना को आलोड़ित करने और जाग्रत करने का काम किया है। नाटक के माध्यम से छोटे बड़े राजनैतिक हथकंडों को दर्शक आसानी से पकड़ सकता है। कैसे अचानक शहर में अशांति होती है और कैसे कर्फ्यू लगता है सब कुछ स्पष्ट हो जाता है। कैसे छोटे और ओछे मुद्दे प्रमुख बना दिये जाते हैं।
27 जुंलाई 2013 को ’दस दिन का अनशन’ का मंचन जॉय स्कूल जबलपुर के विमला ग्रेस ऑडीटोरियम में संपन्न हुआ। विवेचना के इस नाटक मंचन 2011 में प्रारंभ हुए हैं। इसके मंचन जबलपुर में दो बार, भोपाल में दो बार के अलावा उज्जैन, बनारस में हो चुके हैं। जयपुर में 2 और उदयपुर में 4 अगस्त 2013 को इस नाटक के मंचन होंगे। भोपाल दूरदर्शन ने इस नाटक को शूट किया है और शीघ्र ही इसका प्रसारण होने जा रहा है।
दस दिन का अनशन का रचनाकाल सन् 1960 के आसपास का है। आजादी के लगभग 15 साल बाद का वक्त है। मुहल्ले का एक लफंगा बन्नू एक शादीशुदा स्त्री सावित्री के पीछे पड़ जाता है। वो उससे शादी करना चाहता है। इस सिलसिले में कई बार मोहल्ले में पिट चुका है। तब उसकी मुलाकात राजनीति के मंजे खिलाड़ी हरिप्रसाद बाबू से होती है। उनके पास हर बात का हल है और वो हर मुद्दे को ’इशू’ बनाना जानते हैं। हरिप्रसाद बाबा सनकीदास से मिलकर योजना बनाते हैं और बन्नू को दस दिन के लिए अनशन पर बैठा देते हैं। इसके बाद हर रोज एक नया हथकंडा आजमाया जाता है। एक दिन बन्नू के समर्थन में कवि सम्मेलन होता है तो एक दिन महिलाएं बन्नू की आरती करती हैं। युवकों का एक दल बन्नू के हक के लिए नुक्कड़ नाटक करता है। इस दौरान प्रधानमंत्री से बातचीत जारी है। विवाह कानून  में संशोधन का बिल पास कराने की मांग भी उठ रही है। इस बीच कायस्थों और ब्राह्मणों के घरों में पत्थर फिकवा दिये जाते हैं क्योंकि सावित्री कायस्थ है और बन्नू ब्राह्मण। मामला गर्माने के लिए पुलिस थाने पर पथराव करवा दिया जाता है। जिससे शहर में कर्फ्यू लग जाता है। मामला पूरी तरह गर्म हो जाता है।
सावित्री जाकर हरिप्रसाद और सनकीदास से पूछती है कि ये लफंगा मुझ शादीशुदा औरत के पीछे पड़ा है। और तुम लोग इसका साथ दे रहे हो। बाबा सनकी दास कहते हैं कि देवी तुम तो ’इशू’ हो इशू से थोड़े ही पूछा जाता है कि हम आन्दोलन करें या नहीं। नाट्य रूपांतर और निर्देशन में निर्देशक वसंत काशीकर ने बहुत सावधानी से काम लिया है और पचास साल पुरानी कहानी को जस का तस रखा है। ताकि दर्शक अपने निष्कर्ष स्वयं निकाले। काले सफेद की पहचान खुद करे।
विवेचना के इस मंचन में सनकीदास बने संजय गर्ग, हरिप्रसाद बने सीता राम सोनी और सावित्री के रोल में इंदु सूर्यवंशी ने बहुत प्रभावित किया। अन्य भूमिकाओं में आशीष नेमा, अली, संजीव विश्वकर्मा, अभिनव काशीकर, अक्षय ठाकुर, ब्रजेन्द्र सिंह, आयुष राय, अंशुल साहू,          
आदि ने बहुत सधा हुआ अभिनय किया। प्रकाश व्यवस्था जगदीश यादव की थी और मेकअप संजय गर्ग व वसंत काशीकर ने किया। सेट सुरेश विश्वकर्मा ने बनाया था। नाटक का निर्देशन व नाट्य रूपांतर वसंत काशीकर ने किया।
विवेचना ने विजय नगर और आसपास के दर्शकों के लिए जॉय सी से स्कूल के विमला ग्रेस ऑडीटोरियम नाट्य मंचन कर सैकड़ों नए दर्शक बनाये। यही नहीं जॉय स्कूल के 250 बच्चों व स्टाफ को नाट्य मंचन से पूर्व रिहर्सल दिखाकर नाटक होने की प्रक्रिया से जोड़ा जिसे बच्चों और शिक्षिकाओं ने बहुत पसंद किया। इन दर्शकों को पहली बार पता चला कि नाटक कैसे तैयार होता है। यह एक तरह से थियेटर शिक्षण की कक्षा जैसा लगा।
नाटक के अंत में हिमांशु राय बांके बिहारी ब्यौहार व जॉय स्कूल की ओर से अखिलेश मेबिन ने आभार व्यक्त किया। 

विवेचना के नाटक ’मानबोध बाबू’ का मंचन



विवेचना जबलपुर ने काफी दिनों बाद एक बार फिर अपने पुराने नाटक ’मानबोध बाबू’ का मंचन 29 जून 2013 को जाय स्कूल विजयनगर जबलपुर में किया। यह नाटक चन्द्रकिशोर जायसवाल की इसी नाम की कहानी पर आधारित है। यह नाटक दर्शकों में जादू का सा असर करता है। नाटक में दो मुख्य पात्र हैं लेकिन उनकी बातचीत कभी प्रहसन तो कभी उपदेश का काम करती है। पूरा नाटक नव रसों से युक्त है। इसमें रहस्य भी है रोमांच भी है, कौतूहल भी है। हास्य और रोचकता भी है। जबलपुर में काफी दिनों बाद हुए मानबोध बाबू के मंचन को दर्शकों ने हाथों हाथ लिया।
मानबोध बाबू में विवेचना के दो वरिष्ठ कलाकार मुख्य पात्र हैं। सीताराम सोनी और संजय गर्ग। मानबोध बाबू एक मस्तमौला जीव हैं जिन्होंने अपनी नौकरी-व्यापार से सन्यास ले लिया है। ये कलकत्ता में रहते हैं। और समय समय पर घूमने निकल पड़ते हैं। इस समय वो मुम्बई से कलकत्ता जा रहे हैं। उनके साथ सामने की बर्थ पर मोहनलाल यात्रा कर रहे हैं। मिलते ही दोनों में बातचीत शुरू हो जाती है। मानबोध बाबू का स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि वे हिलमिल जाते हैं। जब मानबोध बाबू को पता चलता है कि मोहनलाल अपनी गांव की जमीन जायदाद बेचकर अपने लड़कों के पास रहने जाने का इरादा कर रहे हैं तो वे चौंक जाते हैं। वे मोहन लाल को इस निर्णय का नफा नुकसान समझाते हैं। उनका कहना है कि अपना सबकुछ बेचकर बच्चों के साथ रहना बहुत बड़ी भूल है। आप परजीवी होकर नारकीय जीवन व्यतीत करते हैं। महानगरों के बारे में भी उनका अलग अनुभव है। वे मुम्बई, दिल्ली और कलकत्ता की अलग अलग झांकी दिखाते हैं। इस झांकी में निरंतर अमानवीय होते जा रहे महानगरीय मानव की विविध छबियां प्रस्तुत होती हैं।
मानबोध बाबू की दृष्टि में सबसे अच्छा महानगर है कलकत्ता। उसके बारे में वो कहते हैं कि कलकत्ता में जिंदगी आपके साथ साथ चलती है। मानबोध बाबू अपनी बातचीत के दौरान अच्छी जिंदगी जीने का दर्शन सिखाते जाते हैं। आपको भोला नहीं रहना है। मूर्ख नहीं रहना है। हमेशा चौकन्ना  रहना है। हमेशा लड़ते रहना है। वो अच्छी अच्छी किताबों को पढ़ने की सलाह देते हैं। नाटक का अंत बहुत आकस्मिक और रहस्यपूर्ण है जो कई साल सवाल छोड़ जाता है।
नाटक में निर्देशक ने अनेक दृश्यों का निर्माण अपनी कल्पना से किया है जो बहुत प्रभावशाली है। नाटक का निर्देशन वसंत काशीकर ने किया है। नाट्य रूपांतर संजय गर्ग का है।   

दलित पीड़ित की संस्कृति ही जनसंस्कृति है।



इप्टा की जबलपुर इकाई विवेचना ने 25 मई 2013 को जनसंस्कृति दिवस मनाया। इस अवसर पर सुविख्यात पत्रकार जयंत वर्मा ने मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए कहा कि जब हम जनसंस्कृति की बात करते हैं तो आज के संदर्भ में इस जनसंस्कृति में जन कौन है। क्या ये जन वो है जो शहरों में समस्त सुविधाओं को भोगता हुआ आम आदमी बना हुआ है या वो है जो शहरों और गांवों में अपने पेट भरने की लड़ाई में दिन रात जूझ रहा है। हमें किस संस्कृति के लिये चिंतित होना चाहिए। गांवों और शहरों में दलित, शोषित पीड़ित जन ही भारत का असली जन है जिसकी आय 20 रूपये से भी कम है। कलाएं श्रम के संगीत से पैदा होती हैं। चाहे वो खेतों में काम करने वाला किसान हो या किसी भवन को बनाता मजदूर हो या किसी कोयला खदान में काम करने वाला मेहनतकश हो। भारत में हम जिन कलाओं को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश करते हैं वो तो दरअसल हमारे देश के मेहनतकश वर्ग के द्वारा रची गई हैं। चाहे वो गीत हों, संगीत हो या नृत्य हो।
इस अवसर पर बोलते हुए श्री जयंत वर्मा ने देश के विभिन्न हिस्सों में सास्कृतिक स्तर पर हो रही घटनाओं का भी विस्तार से जिक्र किया। जयंत वर्मा विभिन्न प्रदेशों के ग्रामीण इलाकों में जाकर वहां के लोगों की समस्याओं की पड़ताल करते रहते हैं। उनका अनुभव संसार बहुत व्यापक है।
अपने अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि गांवों में न्यूनतम वेतन की अवधारणा ही ध्वस्त हो गई है। क्योंकि गांव में सदियांे से खेत मजदूरों के लिए एक अलग परंपरा चली आ रही है।
बांधों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि बांधों से जिनकी जमीन जाती है उन्हें केवल मुआवजा मिलता है लेकिन उनका रहने का स्थान और रोजगार दोनों उनसे छिन जाता है। बांध के कारण विस्थापित लोग आज शहरों में आकर मजदूरी करने के लिए विवश हैं। उनके रहने का कोई ठिकाना नहीं है। उन्हें उस बांध से बन रही बिजली या खेती के लिए मिल रहे पानी का कोई लाभ नहीं मिल रहा है।
उन्होंने बताया कि पूंजीपतियों के दुश्चक्र में आज काम के घंटे आठ की जगह ग्यारह करने की न केवल कोशिश हो रही है वरन् एक हद तक वो कामयाब हो चुकी है। आज देश का नौजवान जो ’पैकेज’ पर काम कर रहा है दरअसल न तो उसके लिए कोई काम के घंटे तय हैं और न उसके रोजगार की कोई गारंटी  है। वो केवल अपनी कंपनी के मुनाफा कमाने की मशीन है। हमारा देश पहले सामाजिक कल्याण की भावना - वेलफेयर स्टेट के रूप में काम करता था। आज हमारा देश अपने सभी मूल्य खोता जा रहा है।
देश के कानूनों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि हमारा देश का कानून आज केवल पैसे वालों के लिए और पैसा कमाने वालों के काम का भर है। अंग्रेजों के समय से जो कानून बने हैं उनमें कोई बदलाव नहीं हुआ है। और उन्हें जस का तस बनाकर रखा गया है। लाखों लोग जेल में बेकसूर सड़ रहे हैं और उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। गरीब आदिवासी न्यायाधीश के सामने बस एक शरीर के रूप में खड़ा रहता है। न वो कोई भाषा समझ सकता है और न न्याय प्राप्त करने के लिए उसके पास पैसा है।  
इसके पूर्व विवेचना के सचिव और इप्टा के राष्टीय सचिव मंडल के सदस्य हिमांशु राय ने इप्टा की शुरूआत और इतिहास के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि इस वर्ष इप्टा की स्थापना को सत्तर वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस संगठन ने देश के स्वाधीनता संग्राम में जमकर हिस्सा लिया। आजादी के बाद मची देश की उथलपुथल में इप्टा ने साम्प्रदायिक सद्भाव और शांति की अलख जगाई। इप्टा में देश के सर्वश्रेष्ठ कलाकार शामिल हुए और उन्होंने अपना सर्वश्रेष्ठ काम इप्टा के लिए किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो अरूण कुमार ने की। प्रो अरूण कुमार ने इस अवसर पर कहा कि इप्टा ने देश के सांस्कृतिक आंदोलन को एक नई दिशा दी। इप्टा से प्रेरणा लेकर हजारों नौजवानों ने कला जगत में अपना योगदान दिया। इसका कारण यह भी है कि इप्टा की शुरूआत ही बंगाल के भयानक दुर्भिक्ष से प्रभावित होकर हुई थी। इस अकाल में लाखों लोग बंगाल की सड़कों पर भूख प्यास से मर गए थे। तब बंगाल के कलाकार पूरे देश में बंगाल का हाल बताने निकले थे। यही इप्टा के बनने की पृष्ठभूमि है। इप्टा के इतने वर्षों तक सक्रिय रहने का कारण इसका आम आदमी से जुड़ाव है। इप्टा का तो नारा ही है कि रंगमंच की असली नायक जनता है। इसी सोच के साथ इप्टा से जुड़े हजारों लोगों ने काम किया है और जनता के संगीत, नृत्य, गायन वादन, नाटक को मंच पर प्रदर्शित किया है।
इस अवसर पर इन्दु श्रीवास्तव ने अपनी गजलें सुनाईं। उनकी गजलों को श्रोताओं ने बहुत पसंद किया।
संजय गर्ग ने बलराज साहनी द्वारा लिखे गये दो आलेख पढ़े। आलेखों के माध्यम से बलराज साहनी का क्रमिक विकास पता चलता है। बलराज साहनी ने इप्टा के सबसे कठिन दौर में काम किया और अपने समर्पण और त्याग से इप्टा की नींव को मजबूत किया। विवेचना के कलाकारों ने दो बीघा जमीन, सीमा और क्क्त फिल्म के जो गीत बलराज साहनी पर फिल्माए गए थे उन्हें प्रस्तुत किया। इस कार्यक्रम के साथ इप्टा का इतिहास भी दर्शकों के सामने प्रस्तुत हुआ।
कार्यक्रम का संचालन बांके बिहारी ब्यौहार ने किया। वसंत काशीकर ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि रंगमंच साम्प्रदायिकता और फासीवाद से संघर्ष का हथियार है। विवेचना के इस कार्यक्रम में शहर के सभी रंगकर्मी शामिल हुए।

जबलपुर में गोष्ठी

विवेचना के युवा कलाकारों के बीच संवाद की दृष्टि से एक विचार गोष्ठी का आयोजन 3 अप्रैल 2013 को हिन्दी रंगमंच दिवस पर हुआ। इसमें बोलते हुए हिमांशु राय ने कहा कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र एक अद्भुत व्यक्ति थे। जो केवल 33 वर्ष जिए। लेकिन इन तेंतीस वर्षों में उन्होंने हिन्दी साहित्य और नाटक को जो दिया है वह अमूल्य है। उन्होंने नाटक न केवल लिखे वरन् मंचित भी किए। ये वो समय था जब न मंच था। न नाटक था और न नाटक का कोई इतिहास था। न निर्देशक था न लेखक था। न लाइट थी न मेकअप था। फिर भी भारतेन्दु ने नाटक को अपना अस्त्र बनाया।